Monday, May 25, 2009
सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया
लो देखो अब हर वो राजनेता और राजनीतिक दल अपने अपने दलों के नेताओं के साथ मुंह लटका कर अपनी हार की समीक्षा करने में लग गया है। न उन्हें खाने की चिन्ता है न पीने की। वे न तो किसी से मिल रहे है और न ही उनसे कोई मिल पा रहा है। एक कमरे में बंद ये नेता गलबहियां डालकर जार जार आंसू बहाते हुये अपने हार जाने का गम गलत कर रहे हैं कोई कह रहा है कि जनता ने हमें धोखा दे दिया तो कोई कह रहा है कि हमने जनता से दूरी बना ली थी जिसके कारण हमें ये दिन देखना पड रहा है। चाहे वे लेफट वाले हों या फिर लालू जी या फिर रामविलास पासवान और या फिर अपने पीएम इन वेटिंग आडवानी जी। हरेक का चेहरा लटका हुआ है और चेहरे पर मुर्दनी छाई हुई है। लालू जी कह रहे हैं कि अब वे एक साल दिल्ली की राजनीति नहीं करेंगे। अरे भैया दिल्ली की राजनीति तो तब करोगे न जब दिल्ली में कोई पोस्ट होगी। बिहार और दिल्ली दोनो जगह की पोस्टें तो आप अपने करमों से गंवा बैठे हो बिहार में जिस कुरसी पर बरसों तक आपने और आपकी पत्नी ने राज किया उस कुरसी पर अब नीतीश कुमार कब्जा जमाये बैठे हैं इधर दिल्ली में ‘‘लेडीज फस्र्ट‘‘ के नाते ममता ने आपकी खाली कुरसी पर अपना रूमाल रख कर उसको एंगेज कर दिया है अब बेचारे लालू जाये तो जायें कहां? यही हाल अपने लेफट के नेताओं का है हार की समीक्षा में जुटे है भाई लोग। एक कह रहा है हमें जनता के पास जाना होगा उसके और हमारे बीच काफी दूरी बढ गई है। अब ये बात समझ में आ रही है जब जनता ने बत्ती दे दी वरना पहले तो अपने आप को ‘‘जोधा‘‘ समझने लगे थे ये लोग। जब चाहे सरकार को अडी पटकते रहते थे कि यदि हमारी बात नही मानी तो हम सरकार की सारी की सारी कुरसियां गिरा देंगे पर हुआ उलटा वे तो किसी की कुरसी नही खिसका पाये उलटे उनकी ही कुरसियां खिसक गई अब इन कुरसियों के ‘‘हत्थे‘‘ पकड कर वे रो रो कर हलाकान हो रहे हैं यही हाल अपने नेता पासवान जी का है कभी जीतने का ‘‘रिकार्ड‘‘ बनाया था भाई साहब ने पर जनता ने ऐसी पटखनी दी कि अपनी पार्टी तो छोडो अपने खुद के ही जीतने के लाले पड गये। हाल ये हो गया है कि दिल्ली आयेगे तो सिर्फ घूमने फिरने के लिये क्योकि अब कोई ‘‘धनी धोरी‘‘ तो बचा नही है उनका दिल्ली में। बहुत ऐश कर लिये थे अब राम धुन भजो और पांच साल तक इंतजार करो कि शायद किस्मत फिर पलटी खा जाये। इन नेताओं को अब सब कुछ याद आ रहा है जैसे फिल्मों में ‘‘फ्लेशबैक ‘‘ में पुरानी बातें दिखाई जाती है वैसा ही फ्लेशबैक इनको भी नजर आ रहा है। अपने अपने मंत्रालय के सामने मूंगफली चबाते हुये ये सोच रहे है कि वो भी क्या दिन थे जब अपन यहां के राजा थे पर आज दरबान भी बिना ‘‘पास‘‘ लिये वहां घुसने नही दे रहा है किसी ने सच ही कहा है समय किसी का नही होता शायद इसी को आधार मानकर किसी गीतकार ने ये गीत लिखा था ‘‘सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया‘‘ यह गाना इन पर पूरी तरह सटीक बैठता है।
Saturday, May 23, 2009
कोर्ट का फैसला है मानना तो होगा ही
देश में सबसे बडी अदालत ही होती है। अदालतें सरकारी फैसलों को भी बदलने का दम रखती है उस पर देश का सुप्रीम कोर्ट तो सबसे बडी ताकत रखता है। उसके न्यायाधीश जो निर्णय देते हैं वो कानून बन जाता है इसलिये यह बताया जाता है कि कोर्ट के फैसलों को सर माथे पर रखना चाहिये। बडे बडे लोग जब कोर्ट से मुकदमा हार जाते है उसके बाद भी ये ही कहते हैं कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है अब जिस न्यायालय की इतनी ताकत हो यदि वो कह रहा हो कि बीबी जैसा कहे वैसा ही करो तो जिन्दगी आराम से गुजरेगी तो कौन ऐसा बेबकूफ होगा जो जिन्दगी आराम और शांती से गुजारना न चाहता हो। वैसे भी कोर्ट ने तो यह बात काफी लेट कही है यहां तो हर आदमी पहले से ही बीबी की हां में हां मिला रहा है और ये जरूरी भी है क्योंकि हरशादी शुदा मर्द को मालूम है कि बीबी से पंगा लेना अपने आप को संकट में डालना ही है क्योकि जो लोग बीबी की बात नही मानते हैं उन्हे पत्नी पीडित संघ बनाना पड जाता है जहां तक अपने को मालूम है भारतीय संस्कार में नारी को सबसे बडा दर्जा दिया गया है दुर्गा जी ने बडे बडे राक्षसों का संहार कर दिया था। महाकाली का तो रूप ही ऐसा होता है कि आदमी मारे भय के कांप जाता है उनके तेज के सामने किसी का तेज नही ठहरता। देश के सबसे बडे कोर्ट ने ये सुझाव बडे अनुभव के बाद दिया है ऐसा लगता है और तो और उन्होंने तो वकीलों को ये सलाह भी दे दी है कि अपनी कमाई ले जाकर सीधे बीबी के हाथों में रख दो अपना मानना तो ये है कि अस्सी परसेंट मर्द अपनी तनख्वाह अपनी बीबी के हाथों में ही पहले से ही रखते आ रहे है क्योकि कहते है न पैसा सारी विवादों की जड होता है। पैसा भाई भाई बाप बेटे में जब झगडा करवा सकता है तो मियां और बीबी की तो बिसात ही क्या है सुप्रीम कोर्ट के इस सुझाव के बाद लाखों लोगों ने अपनी अपनी बीबियों को ही अपना खुदा मान लिया है क्योकि वे भी जानते है कि कोर्ट जो कुछ भी कहता है पूरें तथ्यों के आधार पर ही कहता है जहां तक बीबियों को सवाल है तो इसमें तो कोई शक नही है कि यदि बीबी प्रसन्न हो तो आपके सारे गुनाह वो माफ कर देती है बस उसको खुश करने की कला आपको आनी चाहिये और ये भी कोई ज्यादा कठिन काम नही है कभी कभार साडी लाकर दे दो। कभी गहने बनवा दो। किसी दिन लम्बी सैर पर चले जाओ। उसकी खूबसूरती की तारीफ कर दो। उसके भाई बहनों को कोई भेंट दे दो। अपने ससुराल की जम कर बडाई कर दो। पडोसन को उसकी तुलना में बदसूरत बतला दो भले ही वो ऐश्वर्या राय ही क्यों न हो। बस इतने से तो गुर है जो बीबी को खुश रखने के लिये पर्याप्त है। इतने में ही तो उसे लगता है कि उसका मर्द कितना अच्छा और उसे जी जान से चाहने वाला है और वो खुश हो जाती है। कहते हैं न पति और पत्नी गाडी के दो पहिये होते हैं अपना ख्याल तो ये है कि हर शादी शुदा मर्द को पिछला पहिया बन जाना चाहिये और बीबी को बना देना चाहिये अगला पहिया। इससे फायदा ये होगा कि जहां जहां अगला पहिया जायेगा पीछे वाले को मजबूरी में उसके पीछे पीछे जाना ही पडेगा और जब वो उसके पीछे पीछे जायेगा तो गाडी के यहां वहां भटकने की गुंजाईश ही खत्म हो जायेगी। कोर्ट ने जो कुछ भी कहा है उसे तो अपन ने पत्थर की लकीर मानकर उस पर अमल भी शुरू कर दिया है क्योंकि कि अपन भी चाहते हैं कि जितने दिनों की जिन्दगी बची है सुख और शांति से गुजर जाये।
Friday, May 22, 2009
Monday, May 18, 2009
लोकसभा चुनाव रिजल्ट और फिल्मी गाने
लो साहब लोकसभा चुनाव का रिजल्ट आ ही गया। सारे ज्योतिषी सारे मीडिया वालों के अनुमान फेल करते हुये कांग्रेस ने अपने आप को ‘‘सुपर पावर‘‘ बना लिया कल तक जो दल कांग्रेस को आंखे दिखा रहे थे वे सारे के सारे याचक की मुद्रा में उसके दरवाजे पर लार टपकाते हुये खडे हैं। जैसे हिन्दी फिल्मों में हर सिचुअशन के लिये फिल्मी गीतकारों ने गाने लिखे हैं वे सारे के सारे गाने इस रिजल्ट के बाद हर दल पर फिट होते हुये दिखाई दे रहे हैं। शायद इन फिल्मी गीतकारों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके द्वारा लिखे गये ये फिल्मी गाने कभी राजनैतिक दलों और नेताओं पर फिट बैठेगे पर आज वो दिन आ ही गया है जब ये गाने इनके लिये सही साबित हो रहे हैं। सबसे पहले कांग्रेस को ही लें अभी तक क्षेत्रीय दलों के बंधन में जकडी कांग्रेस इनके ब्लेकमेल से मुक्त होकर गा रही है ‘‘अब कोई गुलशन न उजडे अब वतन आजाद है‘‘ इधर वाममोर्चा वाले अपने वोटरों के सामने आंसू बहाते हुये गा रहे है ‘‘हम से का भूल हुई जो ये सजा हमको मिली अब तो चारों ही तरफ बंद है सत्ता की गली‘‘ उधर भाजपा वाले कितनी आशा लगाये थे कि वे सबसे बडे दल के रूप में उभर कर सामने आयेगे पर चुनाव के रिजल्ट ने उनको यह गीत गाने के लिये मजबूर कर दिया। ‘‘क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार में चाहा था क्या मिला तेरे प्यार में‘‘ भाजपा के ही पीएम इन वेटिंग अपने आडवानी जी के सामने अब ये ही गीत बचा है कि वे इसे गाये ‘‘तेरी दुनिया से हो के मजबूर चला मैं बहुत दूर बहुत दूर चला‘‘ लालू यादव जो अभी तक राम विलास जी को अपना सब कुछ मानकर कांग्रेस को आंखे तरेर रहे थे अब कांग्रेस के दरवाजे पर खडे होकर गुनगना रहे हैं ‘‘तेरी राहों में खडे है दिल थाम के हाय हम है दीवाने तेरे नाम के‘‘ कभी कभी इस गाने की बजाय ये इस गीत की तान भी वे छेड देतें हैं ‘‘तेरे दर पर आया हूं कुछ करके जाऊँगा झोली भर के जाऊँगा या मर के जाऊँगा ’’ रहा नीतीष कुमार और शरद यादव का तो वे तय नही कर पा रहे है कि वे क्या करें इसलिये दोनो मिलकर कोरस गा रहे है ‘‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं बडी मुश्किल में हूं कि किधर जाऊं ‘‘ अपनी बहन जी मायावती जिस तीसरे चौथे पांचवे छटवे मोर्चे के साथ मिलकर प्रधानमंत्री बनने का ख्वाव संजो रही थी अब सलमा आगा की आवाज में गा रही हैं ‘‘दिल के अरमां आंसंओ में बह गये हम वफा करके भी तनहा रह गये‘‘ उधर मुलायम और अमर के सामने एक ही रास्ता बचा है कि वो कांग्रेस के दरवाजे पर खडे होकर ये गीत गायें ‘‘मुझ को अपने गले लगालो ए मेरे हमराही तुमको क्या बतलाउ मै कि तुमसे कितना प्यार है‘‘ पश्चिम की शेरनी ममता अपनी जीत पर फूली नही समा रही है और इठला इठला कर कांग्रेस के साथ गा रही हैं ‘‘तुम आज मेरे संग हंस लो तुम आज मेरे संग गालो हंसते गाते इस जीवन की उलझी राह संभालों‘‘सबसे बुरा हाल तो अपने रामविलास भैया का है अपने दो चार चेलों के दम पर हर बार मंत्रीमंडल में षमिल होने वाले भाई जी अब चुपचाप अकेले अपने घर की ओर ये गाना गाते हुये जा रहे हैं ‘‘चल अकेला चल अकेला तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला‘‘ इन सबसे इतर मतदाता अपने बाजुओं को फडफडातें हुये गा रहा है ‘‘जो हमसे टकरायेगा चूर चूर हो जायेगा‘‘ बीच बीच में इन पालीटिकल पार्टियों को वो ये गाना भी सुना देता है ‘‘चाहे लाख करो चतुराई करम का लेख मिटे न रे भाई‘‘
Sunday, May 17, 2009
उल्टे चलोगे तो ये तो होगा ही
दुनिया में हर किसी को सीधा ही चलना पडता है जो भी उल्टा चलता है उसे गच्चा खाना ही पडता है माना कि भारत में यातायात लेफट से चलता है पर बाकी काम तो सीधे यानी राइट से ही होते हैं दाहिना हाथ हर अच्छे काम के लिये उपयोग में आता है किसी की पूजा करना है तो दाहिने हाथ से ही होती है प्रसाद दाहिने हाथ में लिया जाता है अधिकांश लोग दाहिने हाथ से लिखते है अपने सारे काम इसी हाथ से ही करते है माथे पर चंदन इसी हाथ से लगाया जाता है यहां तक कि किसी को रहपट भी मारना होता है तो दाहिने ही हाथ का प्रयोग किया जाता है हर शुभ काम में दाहिने हाथ ही प्रयोग होता है बांये हाथ का उपयोग किस काम के लिये किया जाता है यह बतानें की जरूरत नहीं है पर इतना सब कुछ जानने के बाद भी यदि ये कम्युनिस्ट लेफट यानी उल्टी चाल चल रहे थे तो ये तो होना ही था जो उनके साथ हुआ। बडी बडी बातें करते थे अपने करात साहब। जब चाहे बेचारे मनमोहन सिंह को अडी पटकते रहते थे ये मत करो। ये करो। ये किया तो ठीक नही होगा। मानो मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री न हुये घर को छोटा बच्चा हो गये कि हर बात में उसे टोका जाये। माना कि आप कांग्रेस को सपोर्ट कर रहे थे और सपोर्ट भी इसलिये कर रहे थे कि कही भाजपा वाले सत्ता में न आ जाये वरना कांग्रेस तो आपको कभी फूटी आंख नही सुहाती थी भाजपा के डर से कांग्रेस से हाथ मिलाया तो था पर यहां भी वो ही लेफट यानी बांया हाथ मिलाये हुये थे अब बांये हाथ का बंधन कितना मजबूत रहेगा तो परमाणु समझौते का जरा सा धक्का लगा और हाथ छूट गया। आपको लगा था कि कांग्रेस उनका हाथ छूटते ही धारम धार बह जायेगी पर वे नही जानते थे कि कांग्रेस के पंजे को थामने वाले और भी थे और यही हुआ। आपका हाथ छूटते ही कई दूसरे हाथों ने कांग्रेस के पंजे को लपक लिया। इस चुनाव में आपको इस बात का अहसास दिला दिया वोटरों ने कि उल्टे रास्ते चलने वालों का हश्र क्या होता है? जिस पश्चिम बंगाल और केरल के दम पर ये लोग इतराते थे वहां इनकी ऐसी मटटी पलीद हुई कि दिन में तारे नजर आ गये अब कह रहे है कि हम विपझ में बैठेगे हुजूर जब हार गये हो तो विपझ में तो बैठना ही पडेगा कौन सा अहसान कर रहे हो देश वालों पर ये बतला कर कि हम अब विपझ में बैठेगे। विपझ में नही बेठोगे तो और कहां बेठोगे? आप लोगों के लिये कोई भी कुरसी खाली नही बची है रहा सवाल कांग्रेस का तो कल तक वो आप लोगों का मुह ताकती थी अब आप लोगों को उसका मुंह ताकना पडेगा वैसे भी आप लोगों के पाखंड से सारे भारत के लोग परिचित है दुनिया भर से कम्युनिज्म ने विदाई ले ली पर आप अभी भी उसे उसी तरह चिपकाये घूम रहे हो जैसे बंदरिया अपने मरे बच्चे को अपनी छाती से चिपकाये घूमती है पर देख लिया न आप लोगो ने उल्टा चलने का फल। अरे भैया ये तो सोचो कि सडक पर भी जो आदमी चलता है वो जब तक सीधा नही चलेगा तब तक अपने घर कैसे पहुंचेगा पर आप लोग तो उल्टे चल रहे थे इसलिये फिर वही पंहुच गये जहां से शुरू किया था अभी भी वक्त है अपना नाम लेफट से बदल कर राइट कर लो और सीधे रास्ते चलना स्टार्ट कर दो भगवान ने चाहा तो जैसे सबकी इच्छा पूरी होती है आप लोगों की भी इच्छा कभी न कभी पूरी हो ही जायेगी इति शुभम ।
Saturday, May 16, 2009
धरे रह गये न सारे के सारे एक्जिट पोल
ये मीडिया वाले भी पता नही क्यों चुनाव के दौरान एक्जिट पोल करते रहतें है जब मालूम है कि वोटर आजकल बहुत चालू हो गया है वोट किसी को देता है और बताता कुछ और है तो क्यों उस पर भरोसा करके अपने अपने नतीजे टीवी में दिखलातें फिरते हो। अब क्या रह गई आप लोगों की। सारे के सारे नतीजों पर पानी फेर दिया इन वोटरों ने। कोई कह रहा था कि यूपीए को डेढ सौ से एक सौ अस्सी के बीच सीटे मिलेंगी तो कोई एनडीए को पोने दो सौ तक ले जाने की बात कर रहा था पर जब वोट ईवीईम मशीनों से बाहर आये तो सारे एंकरों के चेहरों से हवाईयां उडने लगीं। जो नेता अपनी पार्टी की सरकार बनाने की बात कह रहे थे न जाने कहां दुबक कर बैठ गये। भले ही टीवी वाले अपने आप को बहुत होशियार समझें पर उनको भी अब पता लग गया होगा कि उनसे ज्यादा होशियार इस देश का मतदाता हो गया है। कब किसको सत्ता की कुरसी पर बैठाना है और कब किसको अडी पटकना है ये उससे ज्यादा अच्छी तरह से कोई नही जानता अपने को तो एक बात आज तक समझ में नहीं आई कि जब हर बार इन टीवी वालों का एक्जिट पोल फेल हो जाता है तो ये बार बार उसको क्यों अपनाते हैं अरे भैया ये हिन्दुस्तान है यहां कब क्या हो जाये किसी को नही मालूम। अब क्या कांग्रेस ने ये सोचा होगा कि उसे इतनी सारी सीटें मिल जायेगी पर मिल गई न। बेचारे आडवानी जी कब से पीएम की सीट के रिज़र्वेशन के लिये ऍप्लिकेशन लगाये थे पर उनका रिज़र्वेशन इस बार भी कन्फर्म नही हो पाया और देखते ही देखते गाडी उनकी आंखों के सामने से प्लेटफोर्म छोडकर आगे निकल गई। अब पांच साल तक फिर वेटिंग में रहना पडेगा कहतें है न आदमी सोचता कुछ और है और होता कुछ और है। यदि आदमी जो सोच रहा है वैसा ही होने लगे तो ऊपर वाले की ताकत को कौन मानेगा। इस बार के चुनावों के बाद अब टीवी वालों को शिवाजी महाराज की शपथ ले लेना चाहिये कि चाहे लोकसभा चुनाव हों विधानसभा चुनाव हों नगर निगम के चुनाव हों या फिर पंचायत के। अब वे एक्जिट पोल नही करेंगे क्योकि इन टीवी के रिपोर्टर जिन लोगों से बात करते है वे न कहो वोट ही डालने न जाते हों पर अपने को ये भी मालूम है कि भले ही इनकी बेइज्जती हो गई हो पर ये अपनी आदतों से बाज नही आयेंगे और हमेशा एक्जिट पोल करते ही रहेंगे लगता है इन लोगों के भीतर विक्रमार्क की आत्मा घुस गई है यही कारण है कि वो अपना हठ नही छोडता और जैसे ही चुनाव आता है एक्जिट पोल करने के लिये तत्पर हो जाता है अब भी वक्त है पहचान लो मतदाताओं की फितरत को और मान लो कि वे वे भले ही बिना पढे लिखे हों गरीब हों कमजोर हों पर आप लोगों की पोल खोलने के लिये वे पूरी तरह से सक्षम है समझ गये न।
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